मंज़िल
जिस मंज़िल की तलाश में यूँ निकल गए हम घर से मंज़िल जब मिली तब उसकी प्यास ही नहीं रही घर के खाने के डब्बे को जो लेकर चले थे घर से जब वक़्त आया तब वो भूख ही नहीं रही उम्मीदें थे पाले पढ़कर वापस घर को आयेंगे ये ३ साल का वक्त है यूँ ही गुज़र जाएँगे वो वक़्त तो गुजर गया हम तैयार भी हो गए पर जब वापस आने को हुआ तो वो घर की आस ही नहीं रही कब से सोच रखा था वापस घर को आऊँगा अब जब आ गया हूँ तब जाना मेरी इस घर में कोई जगह ही नहीं रही किसी दिन अपना एक आशियाना होगा जाने उस दिन इस आशियाने का क्या होगा हमने तो सबमें खुद को देखा है लेकिन कोई खुद में मुझे देखे ऐसी उम्मीद ही नहीं रही तिल तिल के जलने की जलन महसूस होती है कोई तो कहे अपना ये ज़रूरत ज़रूर होती है थे दिल में वो अरमान जब वक़्त हमारा था अब तो वो अरमान ही खुद की ना रही ---Niraj Kumar