श्मशान और ज़िंदगी
श्मशान आकर ये ज्ञान आया आज मैं किसी और के लिए श्मशान आया क्या पाया क्या क्या खोया क्या गया और क्या आया ये सोचता हुआ मैं श्मशान आया तब जाकर मुझे ज्ञान आया हज़ार जोड़ते रहें लाख रखते गयें कौड़ियों के भाव में ज़िंदगी मोड़ते रहें मिट्टी से पत्थर पत्थर से ईंट ईंटों से घर की दीवारें बस जोड़ते रहें एक सुकून की छत एक ठंडी सी फर्श एक गर्म चादर हो ठंड में यही ढूँढते रहें आज बस यही मैं सोचता रह गया क्या मिला क्या खोया ये जोड़ता रह गया श्मशान आकर फिर जवाब आया बर्फ के बिस्तर से उठाकर कंधों की चारपायी पर नीले आसमान की छत के नीचे लाए जाओगे रास्ते से वापस लौट ना आओ इस वास्ते हर चौराहे पर कई बार घुमाए जाओगे फिर सजा होगा टूटी लकड़ियों के ढेर का वो बिस्तर तुम्हारे उन्हीं अपनों से जिनके लिए हज़ारों बार टूटे होगे उठ ना जाओ वापस...