मूर्खता इंसान की
इंसान मूर्खता की मूर्ति है सोचता है ये जीवन उसकी इच्छापूर्ति है भूल जाता है कभी वो प्रथम नहीं इस जगत में जो सोचकर जीवन बिताता है बस इस कृत्य में आज सोचता हूँ कितना मूर्ख था मैं किसी वक्त सोचता था मैं जीवन की पहली किरण हूँ उसकी भूल गया उम्र के इस पड़ाव पर हूँ मैं ये ठौर तो उसके जीवन में आ चुका होगा