मंज़िलों की दौड़

इन मंज़िलों की दौड़ में ये कहाँ आ गए हम, जिस मोड़ से चले थे फिर वहीं आ गए हम 

मंज़िलें तो पता थी और रास्ते भी पता थे, ना जाने किस वजह से यूँ रास्ते भटक गए हम 

अतीत से मिलकर अपने वर्तमान में देखा, तो भविष्य की गहराइयों से मिलने लगा कुछ और ग़म

हमने तो ऐसी कोई दुआ भी नहीं थी माँगी, की ख़ुशियों को ढूँढते हुए सबसे जुदा  हो गए हम 

इस दौड़ के सफ़र में जो साथी मिलते गए, उनकी यादों को तो कब से यूँ भूल भी गए हम 

फिर क्यूँ आज भी उन पलों को, उन यादों को महसूस करते रहे हम 

जब हमारे वर्तमान ने भविष्य की ख़ुशियों भरा दामन, क्यूँ आज भी अतीत में हैं जी रहें हैं हम 

क्यूँ है ये हिचकिचाहट, क्यूँ है मन में ये डर, जब है अपनों का साथ, हैं अपनों के साथ हम 

क्यूँ है ये सन्नाटा, ये दूरियाँ दिलों में, जब मन में हैं अथाह प्रेम और प्रेम में हीं हैं हम 

क्यूँ दूर नहीं कर सकते अपने दिल कि मैल को, जब जानते हैं उत्तर हैं खुद में हम

क्यूँ बंद है बातों का वो सफ़र, वो ख़ुशियों का साथ मनाना, जब जानते हैं की सबके बिना कभी खुश हीं नहीं थे हम 

क्यूँ बंद है अपने बातों के सफ़र का वो ख़ज़ाना, जिसमें ख़ुशियाँ तो ख़ुशियाँ हर एक दुःख भी बाँटते थे हम

क्यूँ है ये खामोशी ये दिल के दरवाज़े पर, जहां यादों की आहट होने पर भी मुस्कुरा जाते थे हम 

क्यूँ बैठकर फिर से जीते नहीं उन पलों को, जिस पल में सबकूछ एक साँस में कह जाते थे हम 

क्यूँ साथ नहीं आ सकते वो दो दिल, जो कभी एक दूज़े के बिना धड़का भी नहीं सकते थे हम 

क्या बदल गया इस मंज़िल के सफ़र में यूँ अचानक, की कुछ कहने को भी पहले सोचते हैं हम

क्या बदल गया अचानक उम्र के इस पड़ाव पर, की कुछ सोचने के पहले यूँ दिल से पूछते हैं हम 

कोशिश भी ना कर सकें ये कैसे मोड़ हैं ज़िंदगी के, ये मंज़िलों की दौड़ में ये कहा आ गाएँ हम 

कुछ हो पता तो कोई बतला  दो हमें, की सफ़र के किस रास्ते पर यूँ हिं यूँ अचानक से ग़लत हो गए हम 

हम जानते हैं एक बात ने लगाई है ठेस दिल को, पर क्या वो इतना मज़बूत था की पूरे ग़लत हो गए हम 

एक मौक़ा तो देते दूर हो जाने का खुद से, पर ऐसा भी क्या कर दिया की मजबूर हो गए हम 

इस वक्त में शायद यही ठीक लगा हो तुम्हें, पर विश्वास भी ना करो क्या इतने ग़ैर हो गए हम 

मालूम है हमारा निर्णय कठिन है स्वीकार करना, पर इस लायक़ भी तो तुमने ही बनाया की सही निर्णय ले सकें हम 

कुछ वक्त तो देते हमें खुद को साबित करने का, इतने नालायक भी तो तुम्हारी नज़रों में नहीं थे हम 

तुमसे कुछ छिपा हो, या तुमने कुछ छिपाया, ऐसे रिश्ते में तो कभी भी नहि थे हम

ज़रा सोचना जब समय हो तुम्हारे पास, क्यूँ ऐसा निर्णय लिया होगा क्यूँ दिल से मजबूर हुए हम

चलो मान जाओ, लौट आओ जब मन हो, बस याद रखो काफ़ी इंतज़ार में हैं हम


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