प्रेम

दूरियों से नजदीकी और नजदीकियों से दूरियां, कौन कहता है प्रेम में जरूरी हैं शब्दों की बारीकियां

प्रेम तो वो है मनुष्य को निःशब्द कर देता है, अन्यथा कैसे एक अजन्मे के प्रति मां को प्रेम का आधार बना देता है

प्रेम तो वो है जो दूर होकर भी नजदीक आने का कारण बना  देता है, अन्यथा कैसे पिता के काम से बाहर होने पर भी बच्चों की हर जरूरत का मददगार बना देता है

प्रेम वो नही जो एक पुरुष एक स्त्री से एक बंद कमरे में कर लें, प्रेम तो वो है जो हजार बंदिशों में भी उन्मुक्त गगन की सैर एक साथ कर लें

प्रेम वो नहीं जो शब्दों का मोहताज हो, प्रेम तो वो है जहां बिना शब्दों के हीं सिर्फ नजरों से बात हो

प्रेम वो भी नहीं जहां सिर्फ पाने की चाहत हो, प्रेम तो वो है जहां खुद को खोकर भी सब कुछ पा लेने की चाहत हो

प्रेम वो भी नहीं जहां सिर्फ़ अपनों के साथ ख़ुशियों में रहें, प्रेम तो वो है जहां दूर होकर भी दुःख में भरोसा साथ रखें 

प्रेम वो भी  नहीं जो बाज़ार की चकाचौंध से ख़रीद लाएँ, प्रेम तो वो है जो अंधेरे में भी उस रोशनी का सिर्फ़ एहसास दे जाए  

 


Comments

  1. Kya baat hai ...acha line h
    “ दूरियों से नजदीकी और नजदीकियों से दूरियां, कौन कहता है प्रेम में जरूरी हैं शब्दों की बारीकियां”

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

श्मशान और ज़िंदगी

साथ